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    Saturday, July 27, 2013

    विष्णु जी की आरती

    जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।
    भक्तजनों के संकट, छन में दूर करे॥ \ जय ..
    जो ध्यावै फल पावै, दु:ख बिनसै मनका।
    सुख सम्पत्ति घर आवै, कष्ट मिटै तनका॥ \ जय ..
    मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।
    तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ \ जय ..
    तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
    पार ब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ \ जय ..
    तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
    मैं मुरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ \ जय ..
    तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
    किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमती॥ \ जय ..
    दीनबन्धु, दु:खहर्ता तुम ठाकुर मेरे।
    अपने हाथ उठाओ, द्वार पडा तेरे॥ \ जय ..
    विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
    श्रद्धा-भक्ति बढाओ, संतन की सेवा॥ \ जय ..
    जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।
    मायातीत, महेश्वर मन-वच-बुद्धि परे॥ जय..
    आदि, अनादि, अगोचर, अविचल, अविनाशी।
    अतुल, अनन्त, अनामय, अमित, शक्ति-राशि॥ जय..
    अमल, अकल, अज, अक्षय, अव्यय, अविकारी।
    सत-चित-सुखमय, सुन्दर शिव सत्ताधारी॥ जय..
    विधि-हरि-शंकर-गणपति-सूर्य-शक्तिरूपा।
    विश्व चराचर तुम ही, तुम ही विश्वभूपा॥ जय..
    माता-पिता-पितामह-स्वामि-सुहृद्-भर्ता।
    विश्वोत्पादक पालक रक्षक संहर्ता॥ जय.. 
    साक्षी, शरण, सखा, प्रिय प्रियतम, पूर्ण प्रभो।
    केवल-काल कलानिधि, कालातीत, विभो॥ जय..
    राम-कृष्ण करुणामय, प्रेमामृत-सागर।
    मन-मोहन मुरलीधर नित-नव नटनागर॥ जय..
    सब विधि-हीन, मलिन-मति, हम अति पातकि-जन।
    प्रभुपद-विमुख अभागी, कलि-कलुषित तन मन॥ जय..
    आश्रय-दान दयार्णव! हम सबको दीजै।
    पाप-ताप हर हरि! सब, निज-जन कर लीजै॥ जय..

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