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    Friday, July 26, 2013

    श्री राम चालीसा

    || चौपाई ||

    श्री रघुवीर भक्त हितकारी । सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ॥

    निशिदिन ध्यान धरै जो कोई । ता सम भक्त और नहिं होई ॥

    ध्यान धरे शिवजी मन माहीं । ब्रहृ इन्द्र पार नहिं पाहीं ॥

    दूत तुम्हार वीर हनुमाना । जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना ॥

    तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला । रावण मारि सुरन प्रतिपाला ॥

    तुम अनाथ के नाथ गुंसाई । दीनन के हो सदा सहाई ॥

    ब्रहादिक तव पारन पावैं । सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ॥

    चारिउ वेद भरत हैं साखी । तुम भक्तन की लज्जा राखीं ॥

    गुण गावत शारद मन माहीं । सुरपति ताको पार न पाहीं ॥

    नाम तुम्हार लेत जो कोई । ता सम धन्य और नहिं होई ॥

    राम नाम है अपरम्पारा । चारिहु वेदन जाहि पुकारा ॥

    गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो । तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो ॥

    शेष रटत नित नाम तुम्हारा । महि को भार शीश पर धारा ॥

    फूल समान रहत सो भारा । पाव न कोऊ तुम्हरो पारा ॥

    भरत नाम तुम्हरो उर धारो । तासों कबहुं न रण में हारो ॥

    नाम शक्षुहन हृदय प्रकाशा । सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ॥

    लखन तुम्हारे आज्ञाकारी । सदा करत सन्तन रखवारी ॥

    ताते रण जीते नहिं कोई । युद्घ जुरे यमहूं किन होई ॥

    महालक्ष्मी धर अवतारा । सब विधि करत पाप को छारा ॥

    सीता राम पुनीता गायो । भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ॥

    घट सों प्रकट भई सो आई । जाको देखत चन्द्र लजाई ॥

    सो तुमरे नित पांव पलोटत । नवो निद्घि चरणन में लोटत ॥

    सिद्घि अठारह मंगलकारी । सो तुम पर जावै बलिहारी ॥

    औरहु जो अनेक प्रभुताई । सो सीतापति तुमहिं बनाई ॥

    इच्छा ते कोटिन संसारा । रचत न लागत पल की बारा ॥

    जो तुम्हे चरणन चित लावै । ताकी मुक्ति अवसि हो जावै ॥

    जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा । नर्गुण ब्रहृ अखण्ड अनूपा ॥

    सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी । सत्य सनातन अन्तर्यामी ॥

    सत्य भजन तुम्हरो जो गावै । सो निश्चय चारों फल पावै ॥

    सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं । तुमने भक्तिहिं सब विधि दीन्हीं ॥

    सुनहु राम तुम तात हमारे । तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे ॥

    तुमहिं देव कुल देव हमारे । तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ॥

    जो कुछ हो सो तुम ही राजा । जय जय जय प्रभु राखो लाजा ॥

    राम आत्मा पोषण हारे । जय जय दशरथ राज दुलारे ॥

    ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा । नमो नमो जय जगपति भूपा ॥

    धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा । नाम तुम्हार हरत संतापा ॥

    सत्य शुद्घ देवन मुख गाया । बजी दुन्दुभी शंख बजाया ॥

    सत्य सत्य तुम सत्य सनातन । तुम ही हो हमरे तन मन धन ॥

    याको पाठ करे जो कोई । ज्ञान प्रकट ताके उर होई ॥

    आवागमन मिटै तिहि केरा । सत्य वचन माने शिर मेरा ॥

    और आस मन में जो होई । मनवांछित फल पावे सोई ॥

    तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै । तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ॥

    साग पत्र सो भोग लगावै । सो नर सकल सिद्घता पावै ॥

    अन्त समय रघुबरपुर जाई । जहां जन्म हरि भक्त कहाई ॥

    श्री हरिदास कहै अरु गावै । सो बैकुण्ठ धाम को पावै ॥


    ॥ दोहा ॥

    सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय ।
    हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय ॥

    राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय ।
    जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्घ हो जाय ॥


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