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    Saturday, July 27, 2013

    सत्यनारायण जी की आरती

    जय लक्ष्मी रमणा, श्री लक्ष्मी रमणा।
    सत्यनारायण स्वामी जन-पातक-हरणा।। जय..

    रत्नजटित सिंहासन अद्भुत छबि राजै।
    नारद करत निराजन घंटा ध्वनि बाजै।। जय..

    प्रकट भये कलि कारण, द्विज को दरस दियो।
    बूढ़े ब्राह्मण बनकर कंचन-महल कियो।।जय.।।

    दुर्बल भील कठारो, जिनपर कृपा करी।
    चन्द्रचूड़ एक राजा, जिनकी बिपति हरी।। जय..

    वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्हीं।
    सो फल भोग्यो प्रभुजी फिर अस्तुति कीन्हीं।। जय..

    भाव-भक्ति के कारण छिन-छिन रूप धरयो।
    श्रद्धा धारण कीनी, तिनको काज सरयो।। जय..

    ग्वाल-बाल सँग राजा वन में भक्ति करी।
    मनवांछित फल दीन्हों दीनदयालु हरी।। जय..

    चढ़त प्रसाद सवायो कदलीफल, मेवा।
    धूप-दीप-तुलसी से राजी सत्यदेवा।। जय..

    श्री सत्यनारायण जी की आरती जो कोई नर गावै।
    तन-मन-सुख-सम्पत्ति मन-वांछित फल पावै।। जय..

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