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    Friday, July 26, 2013

    श्री लक्ष्मी चालीसा

    || चौपाई ||

    सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही । ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही ॥

    तुम समान नहिं कोई उपकारी । सब विधि पुरवहु आस हमारी ॥

    जय जय जगत जननि जगदम्बा । सबकी तुम ही हो अवलम्बा ॥

    तुम ही हो सब घट घट वासी । विनती यही हमारी खासी ॥

    जगजननी जय सिन्धु कुमारी । दीनन की तुम हो हितकारी ॥

    विनवौं नित्य तुमहिं महारानी । कृपा करौ जग जननि भवानी ॥

    केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी ॥

    कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी । जगजननी विनती सुन मोरी ॥

    ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता । संकट हरो हमारी माता ॥

    क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो । चौदह रत्न सिन्धु में पायो ॥

    चौदह रत्न में तुम सुखरासी । सेवा कियो प्रभु बनि दासी ॥

    जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा । रुप बदल तहं सेवा कीन्हा ॥

    स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा । लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा ॥

    तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं । सेवा कियो हृदय पुलकाहीं ॥

    अपनाया तोहि अन्तर्यामी । विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी ॥

    तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी । कहं लौ महिमा कहौं बखानी ॥

    मन क्रम वचन करै सेवकाई । मन इच्छित वांछित फल पाई ॥

    तजि छल कपट और चतुराई । पूजहिं विविध भांति मनलाई ॥

    और हाल मैं कहौं बुझाई । जो यह पाठ करै मन लाई ॥

    ताको कोई कष्ट न होई । मन इच्छित पावै फल सोई ॥

    त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि । त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी ॥

    जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै । ध्यान लगाकर सुनै सुनावै ॥

    ताकौ कोई न रोग सतावै । पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै ॥

    पुत्रहीन अरु संपति हीना । अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना ॥

    विप्र बोलाय कै पाठ करावै । शंका दिल में कभी न लावै ॥

    पाठ करावै दिन चालीसा । ता पर कृपा करैं गौरीसा ॥

    सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै । कमी नहीं काहू की आवै ॥

    बारह मास करै जो पूजा । तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ॥

    प्रतिदिन पाठ करै मन माही । उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं ॥

    बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई । लेय परीक्षा ध्यान लगाई ॥

    करि विश्वास करै व्रत नेमा । होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा ॥

    जय जय जय लक्ष्मी भवानी । सब में व्यापित हो गुण खानी ॥

    तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं । तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं ॥

    मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै । संकट काटि भक्ति मोहि दीजै ॥

    भूल चूक करि क्षमा हमारी । दर्शन दजै दशा निहारी ॥

    बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी । तुमहि अछत दुःख सहते भारी ॥

    नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में । सब जानत हो अपने मन में ॥

    रुप चतुर्भुज करके धारण । कष्ट मोर अब करहु निवारण ॥

    केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई । ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई ॥


    ॥ दोहा ॥

    त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास ।
    जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश ॥

    रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर ।
    मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर ॥


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