• All types of bhakti bhajan, aarti, chalisa etc. available here.

    Friday, July 26, 2013

    श्री चित्रगुप्त चालीसा

    || दोहा ||

    सुमिर चित्रगुप्त ईश को, सतत नवाऊ शीश।
    ब्रह्मा विष्णु महेश सह, रिनिहा भए जगदीश ।।

    करो कृपा करिवर वदन, जो सरशुती सहाय।
    चित्रगुप्त जस विमलयश, वंदन गुरूपद लाय ।।


    || चौपाई ||

    जय चित्रगुप्त ज्ञान रत्नाकर । जय यमेश दिगंत उजागर ।।

    अज सहाय अवतरेउ गुसांई । कीन्हेउ काज ब्रम्ह कीनाई ।।

    श्रृष्टि सृजनहित अजमन जांचा । भांति-भांति के जीवन राचा ।।

    अज की रचना मानव संदर । मानव मति अज होइ निरूत्तर ।।

    भए प्रकट चित्रगुप्त सहाई । धर्माधर्म गुण ज्ञान कराई ।।

    राचेउ धरम धरम जग मांही । धर्म अवतार लेत तुम पांही ।।

    अहम विवेकइ तुमहि विधाता । निज सत्ता पा करहिं कुघाता ।।

    श्रष्टि संतुलन के तुम स्वामी । त्रय देवन कर शक्ति समानी ।।

    पाप मृत्यु जग में तुम लाए । भयका भूत सकल जग छाए ।।

    महाकाल के तुम हो साक्षी । ब्रम्हउ मरन न जान मीनाक्षी ।।

    धर्म कृष्ण तुम जग उपजायो । कर्म क्षेत्र गुण ज्ञान करायो ।।

    राम धर्म हित जग पगु धारे । मानवगुण सदगुण अति प्यारे ।।

    विष्णु चक्र पर तुमहि विराजें । पालन धर्म करम शुचि साजे ।।

    महादेव के तुम त्रय लोचन । प्रेरकशिव अस ताण्डव नर्तन ।।

    सावित्री पर कृपा निराली । विद्यानिधि माॅं सब जग आली ।।

    रमा भाल पर कर अति दाया । श्रीनिधि अगम अकूत अगाया ।।

    ऊमा विच शक्ति शुचि राच्यो । जाकेबिन शिव शव जग बाच्यो ।।

    गुरू बृहस्पति सुर पति नाथा । जाके कर्म गहइ तव हाथा ।।

    रावण कंस सकल मतवारे । तव प्रताप सब सरग सिधारे ।।

    प्रथम् पूज्य गणपति महदेवा । सोउ करत तुम्हारी सेवा ।।

    रिद्धि सिद्धि पाय द्वैनारी । विघ्न हरण शुभ काज संवारी ।।

    व्यास चहइ रच वेद पुराना । गणपति लिपिबध हितमन ठाना ।।

    पोथी मसि शुचि लेखनी दीन्हा । असवर देय जगत कृत कीन्हा ।।

    लेखनि मसि सह कागद कोरा । तव प्रताप अजु जगत मझोरा ।।

    विद्या विनय पराक्रम भारी । तुम आधार जगत आभारी ।।

    द्वादस पूत जगत अस लाए । राशी चक्र आधार सुहाए ।।

    जस पूता तस राशि रचाना । ज्योतिष केतुम जनक महाना ।।

    तिथी लगन होरा दिग्दर्शन । चारि अष्ट चित्रांश सुदर्शन ।।

    राशी नखत जो जातक धारे । धरम करम फल तुमहि अधारे।।

    राम कृष्ण गुरूवर गृह जाई । प्रथम गुरू महिमा गुण गाई ।।

    श्री गणेश तव बंदन कीना । कर्म अकर्म तुमहि आधीना ।।

    देववृत जप तप वृत कीन्हा । इच्छा मृत्यु परम वर दीन्हा ।।

    धर्महीन सौदास कुराजा । तप तुम्हार बैकुण्ठ विराजा ।।

    हरि पद दीन्ह धर्म हरि नामा । कायथ परिजन परम पितामा ।।

    शुर शुयशमा बन जामाता । क्षत्रिय विप्र सकल आदाता ।।

    जय जय चित्रगुप्त गुसांई । गुरूवर गुरू पद पाय सहाई ।।

    जो शत पाठ करइ चालीसा । जन्ममरण दुःख कटइ कलेसा ।।

    विनय करैं कुलदीप शुवेशा । राख पिता सम नेह हमेशा ।।


    || दोहा ||

    ज्ञान कलम, मसि सरस्वती, अंबर है मसिपात्र।
    कालचक्र की पुस्तिका, सदा रखे दंडास्त्र।।

    पाप पुन्य लेखा करन, धार्यो चित्र स्वरूप।
    श्रृष्टिसंतुलन स्वामीसदा, सरग नरक कर भूप।।


    No comments:

    Post a Comment

    Fashion

    Beauty

    Travel